श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

यानीह विश्‍वविलयोद्भववृत्तिहेतुः

कर्माण्यनन्यविषयाणि हरिश्‍चकार।

यस्त्वंग गायति शृणोत्यनुमोदते वा

भक्तिर्भवेद् भगवति ह्यपवर्गमार्गे॥ ४५

yānīha viśvavilayodbhavavṛttihetuḥ

karmāṇyananyaviṣayāṇi hariścakāra|

yastvaṃga gāyati śṛṇotyanumodate vā

bhaktirbhaved bhagavati hyapavargamārge|| 45

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने जो लीलाएँ की हैं, उन्हें दूसरा कोई नहीं कर सकता। परीक्षित्! वे विश्‍वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके परम कारण हैं। जो उनकी लीलाओंका गान, श्रवण और गान-श्रवण करनेवालोंका अनुमोदन करता है, उसे मोक्षके मार्गस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें परम प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ४५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
कृष्णगार्हस्थ्यदर्शनं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ ६९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें