राजन्! भगवान् नारायण सारे जगत्के कल्याणके लिये अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाको स्वीकार करते हैं और इस प्रकार मनुष्योंकी-सी लीला करते हैं। द्वारकापुरीमें सोलह हजारसे भी अधिक पत्नियाँ अपनी सलज्ज एवं प्रेमभरी चितवन तथा मन्द-मन्द मुसकानसे उनकी सेवा करती थीं और वे उनके साथ विहार करते थे॥ ४४॥
एवं मनुष्यपदवीमनुवर्तमानो
नारायणोऽखिलभवाय गृहीतशक्तिः।
रेमेऽङ्ग षोडशसहस्रवरांगनानां
सव्रीडसौहृदनिरीक्षणहासजुष्टः॥ ४४
राजन्! भगवान् नारायण सारे जगत्के कल्याणके लिये अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाको स्वीकार करते हैं और इस प्रकार मनुष्योंकी-सी लीला करते हैं। द्वारकापुरीमें सोलह हजारसे भी अधिक पत्नियाँ अपनी सलज्ज एवं प्रेमभरी चितवन तथा मन्द-मन्द मुसकानसे उनकी सेवा करती थीं और वे उनके साथ विहार करते थे॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 566) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/69/44/