फिर भी ब्रह्मस्वरूप नारदजी! आप कुछ-न-कुछ आज्ञा अवश्य कीजिये और हमें सेवाका अवसर देकर हमारा जन्म सफल कीजिये।’ नारदजी यह सब देख-सुनकर चकित और विस्मित हो रहे थे। वे वहाँसे उठकर चुपचाप दूसरे महलमें चले गये॥ २२॥✎ 1705
अथापि ब्रूहि नो ब्रह्मन् जन्मैतच्छोभनं कुरु।
स तु विस्मित उत्थाय तूष्णीमन्यदगाद् गृहम्॥ २२
फिर भी ब्रह्मस्वरूप नारदजी! आप कुछ-न-कुछ आज्ञा अवश्य कीजिये और हमें सेवाका अवसर देकर हमारा जन्म सफल कीजिये।’ नारदजी यह सब देख-सुनकर चकित और विस्मित हो रहे थे। वे वहाँसे उठकर चुपचाप दूसरे महलमें चले गये॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 563) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/69/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)