श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

अथापि ब्रूहि नो ब्रह्मन् जन्मैतच्छोभनं कुरु।

स तु विस्मित उत्थाय तूष्णीमन्यदगाद् गृहम्॥ २२

athāpi brūhi no brahman janmaitacchobhanaṃ kuru|

sa tu vismita utthāya tūṣṇīmanyadagād gṛham|| 22

अर्थ

फिर भी ब्रह्मस्वरूप नारदजी! आप कुछ-न-कुछ आज्ञा अवश्य कीजिये और हमें सेवाका अवसर देकर हमारा जन्म सफल कीजिये।’ नारदजी यह सब देख-सुनकर चकित और विस्मित हो रहे थे। वे वहाँसे उठकर चुपचाप दूसरे महलमें चले गये॥ २२॥✎ 1705

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1705 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: यज्ञ-कुण्डोंमें → यज्ञकुण्डोंमें

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