श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं प्रपन्‍नैः संवि‌ग्‍नैर्वेपमानायनैर्बलः।

प्रसादितः सुप्रसन्‍नो मा भैष्टेत्यभयं ददौ॥ ४९

evaṃ prapannaiḥ saṃvignairvepamānāyanairbalaḥ|

prasāditaḥ suprasanno mā bhaiṣṭetyabhayaṃ dadau|| 49

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कौरवोंका नगर डगमगा रहा था और वे अत्यन्त घबराहटमें पड़े हुए थे। जब सब-के-सब कुरुवंशी इस प्रकार भगवान् बलरामजीकी शरणमें आये और उनकी स्तुति-प्रार्थना की, तब वे प्रसन्‍न हो गये और ‘डरो मत’ ऐसा कहकर उन्हें अभयदान दिया॥ ४९॥

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