श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

कोपस्तेऽखिलशिक्षार्थं न द्वेषान्‍न च मत्सरात्।

बिभ्रतो भगवन् सत्त्वं स्थितिपालनतत्परः॥ ४७

kopaste'khilaśikṣārthaṃ na dveṣānna ca matsarāt|

bibhrato bhagavan sattvaṃ sthitipālanatatparaḥ|| 47

अर्थ

भगवन्! आप जगत‍्की स्थिति और पालनके लिये विशुद्ध सत्त्वमय शरीर ग्रहण किये हुए हैं। आपका यह क्रोध द्वेष या मत्सरके कारण नहीं है। यह तो समस्त प्राणियोंको शिक्षा देनेके लिये है॥ ४७॥

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