आप जगत्की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके एकमात्र कारण हैं और स्वयं निराधार स्थित हैं। सर्वशक्तिमान् प्रभो! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि कहते हैं कि आप खिलाड़ी हैं और ये सब-के-सब लोग आपके खिलौने हैं॥ ४५॥
स्थित्युत्पत्त्यप्ययानां त्वमेको हेतुर्निराश्रयः।
लोकान् क्रीडनकानीश क्रीडतस्ते वदन्ति हि॥ ४५
आप जगत्की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके एकमात्र कारण हैं और स्वयं निराधार स्थित हैं। सर्वशक्तिमान् प्रभो! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि कहते हैं कि आप खिलाड़ी हैं और ये सब-के-सब लोग आपके खिलौने हैं॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.68.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 559) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/68/45/