श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

स्थित्युत्पत्त्यप्ययानां त्वमेको हेतुर्निराश्रयः।

लोकान् क्रीडनकानीश क्रीडतस्ते वदन्ति हि॥ ४५

sthityutpattyapyayānāṃ tvameko heturnirāśrayaḥ|

lokān krīḍanakānīśa krīḍataste vadanti hi|| 45

अर्थ

आप जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके एकमात्र कारण हैं और स्वयं निराधार स्थित हैं। सर्वशक्तिमान् प्रभो! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि कहते हैं कि आप खिलाड़ी हैं और ये सब-के-सब लोग आपके खिलौने हैं॥ ४५॥

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