अपने परम हितैषी और प्रियतम बलरामजीका आगमन सुनकर कौरवोंकी प्रसन्नताकी सीमा न रही। वे उद्धवजीका विधिपूर्वक सत्कार करके अपने हाथोंमें मांगलिक सामग्री लेकर बलरामजीकी अगवानी करने चले॥ १८॥
तेऽतिप्रीतास्तमाकर्ण्य प्राप्तं रामं सुहृत्तमम्।
तमर्चयित्वाभिययुः सर्वे मंगलपाणयः॥ १८
अपने परम हितैषी और प्रियतम बलरामजीका आगमन सुनकर कौरवोंकी प्रसन्नताकी सीमा न रही। वे उद्धवजीका विधिपूर्वक सत्कार करके अपने हाथोंमें मांगलिक सामग्री लेकर बलरामजीकी अगवानी करने चले॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.68.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 555) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/68/18/