श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

तस्य काशिपतिर्मित्रं पार्ष्णिग्राहोऽन्वयान्‍नृप।

अक्षौहिणीभिस्तिसृभिरपश्यत् पौण्ड्रकं हरिः॥ १२

tasya kāśipatirmitraṃ pārṣṇigrāho'nvayānnṛpa|

akṣauhiṇībhistisṛbhirapaśyat pauṇḍrakaṃ hariḥ|| 12

अर्थ

काशीका राजा पौण्ड्रकका मित्र था। अतः वह भी उसकी सहायता करनेके लिये तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ उसके पीछे-पीछे आया। परीक्षित्! अब भगवान् श्रीकृष्णने पौण्ड्रकको देखा॥ १२॥✎ 1700

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1700 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: काशि-राजके → काशिराजके

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