अब यमुनाजीकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान् बलरामजीने उन्हें क्षमा कर दिया और फिर जैसे गजराज हथिनियोंके साथ क्रीडा करता है, वैसे ही वे गोपियोंके साथ जलक्रीडा करने लगे॥ २८॥
ततो व्यमुंचद् यमुनां याचितो भगवान् बलः।
विजगाह जलं स्त्रीभिः करेणुभिरिवेभराट्॥ २८
अब यमुनाजीकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान् बलरामजीने उन्हें क्षमा कर दिया और फिर जैसे गजराज हथिनियोंके साथ क्रीडा करता है, वैसे ही वे गोपियोंके साथ जलक्रीडा करने लगे॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.65.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 545) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/65/28/