इसलिये मेरे आत्मीयो! यदि ब्राह्मण अपराध करे, तो भी उससे द्वेष मत करो। वह मार ही क्यों न बैठे या बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे, उसे तुमलोग सदा नमस्कार ही करो॥ ४१॥✎ 1698212421252126
विप्रं कृतागसमपि नैव द्रुह्यत मामकाः।
घ्नन्तं बहु शपन्तं वा नमस्कुरुत नित्यशः॥ ४१
इसलिये मेरे आत्मीयो! यदि ब्राह्मण अपराध करे, तो भी उससे द्वेष मत करो। वह मार ही क्यों न बैठे या बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे, उसे तुमलोग सदा नमस्कार ही करो॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 541) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/41/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)