न मे ब्रह्मधनं भूयाद् यद् गृद्ध्वाल्पायुषो नराः१।
पराजिताश्च्युता राज्याद् भवन्त्युद्वेजिनोऽहयः२॥ ४०
na me brahmadhanaṃ bhūyād yad gṛddhvālpāyuṣo narāḥ|
parājitāścyutā rājyād bhavantyudvejino'hayaḥ|| 40
अर्थ
इसलिये मैं तो यही चाहता हूँ कि ब्राह्मणोंका धन कभी भूलसे भी मेरे कोषमें न आये, क्योंकि जो लोग ब्राह्मणोंके धनकी इच्छा भी करते हैं—उसे छीननेकी बात तो अलग रही—वे इस जन्ममें अल्पायु, शत्रुओंसे पराजित और राज्यभ्रष्ट हो जाते हैं और मृत्युके बाद भी वे दूसरोंको कष्ट देनेवाले साँप ही होते हैं॥ ४०॥✎ 1698212421252126
न मे ब्रह्मधनं भूयाद् यद् गृद्ध्वाल्पायुषो नराः।
पराजिताश्च्युता राज्याद् भवन्त्युद्वेजिनोऽहयः॥ ४०
इसलिये मैं तो यही चाहता हूँ कि ब्राह्मणोंका धन कभी भूलसे भी मेरे कोषमें न आये, क्योंकि जो लोग ब्राह्मणोंके धनकी इच्छा भी करते हैं—उसे छीननेकी बात तो अलग रही—वे इस जन्ममें अल्पायु, शत्रुओंसे पराजित और राज्यभ्रष्ट हो जाते हैं और मृत्युके बाद भी वे दूसरोंको कष्ट देनेवाले साँप ही होते हैं॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 541) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/40/