श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

कृकलासं गिरिनिभं वीक्ष्य विस्मितमानसाः।

तस्य चोद्धरणे यत्‍नं चक्रुस्ते कृपयान्विताः॥ ३

kṛkalāsaṃ girinibhaṃ vīkṣya vismitamānasāḥ|

tasya coddharaṇe yatnaṃ cakruste kṛpayānvitāḥ|| 3

अर्थ

वह जीव पर्वतके समान आकारका एक गिरगिट था। उसे देखकर उनके आश्‍चर्यकी सीमा न रही। उनका हृदय करुणासे भर आया और वे उसे बाहर निकालनेका प्रयत्‍न करने लगे॥ ३॥

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