वह जीव पर्वतके समान आकारका एक गिरगिट था। उसे देखकर उनके आश्चर्यकी सीमा न रही। उनका हृदय करुणासे भर आया और वे उसे बाहर निकालनेका प्रयत्न करने लगे॥ ३॥
कृकलासं गिरिनिभं वीक्ष्य विस्मितमानसाः।
तस्य चोद्धरणे यत्नं चक्रुस्ते कृपयान्विताः॥ ३
वह जीव पर्वतके समान आकारका एक गिरगिट था। उसे देखकर उनके आश्चर्यकी सीमा न रही। उनका हृदय करुणासे भर आया और वे उसे बाहर निकालनेका प्रयत्न करने लगे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 536) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/3/