श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

क्रीडित्वा सुचिरं तत्र विचिन्वन्तः पिपासिताः।

जलं निरुदके कूपे ददृशुः सत्त्वमद्भुतम्॥ २

krīḍitvā suciraṃ tatra vicinvantaḥ pipāsitāḥ|

jalaṃ nirudake kūpe dadṛśuḥ sattvamadbhutam|| 2

अर्थ

वहाँ बहुत देरतक खेल खेलते हुए उन्हें प्यास लग आयी। अब वे इधर-उधर जलकी खोज करने लगे। वे एक कूएँके पास गये; उसमें जल तो था नहीं, एक बड़ा विचित्र जीव दीख पड़ा॥ २॥

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