श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

ब्रह्मण्यस्य वदान्यस्य तव दासस्य केशव।

स्मृतिर्नाद्यापि विध्वस्ता भवत्सन्दर्शनार्थिनः॥ २५

brahmaṇyasya vadānyasya tava dāsasya keśava|

smṛtirnādyāpi vidhvastā bhavatsandarśanārthinaḥ|| 25

अर्थ

प्रभो! मैं ब्राह्मणोंका सेवक, उदार, दानी और आपका भक्त था। मुझे इस बातकी उत्कट अभिलाषा थी कि किसी प्रकार आपके दर्शन हो जायँ। इस प्रकार आपकी कृपासे मेरे पूर्वजन्मोंकी स्मृति नष्ट न हुई॥ २५॥

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