‘राजन्! तुम पहले अपने पापका फल भोगना चाहते हो या पुण्यका? तुम्हारे दान और धर्मके फलस्वरूप तुम्हें ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होनेवाला है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं है’॥ २३॥
पूर्वं त्वमशुभं भुंक्षे उताहो नृपते शुभम्।
नान्तं दानस्य धर्मस्य पश्ये लोकस्य भास्वतः॥ २३
‘राजन्! तुम पहले अपने पापका फल भोगना चाहते हो या पुण्यका? तुम्हारे दान और धर्मके फलस्वरूप तुम्हें ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होनेवाला है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं है’॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 539) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/23/