रुक्मीके इस प्रकार आक्षेप और राजाओंके उपहास करनेपर बलरामजी क्रोधसे आगबबूला हो उठे। उन्होंने एक मुद्गर उठाया और उस मांगलिक सभामें ही रुक्मीको मार डाला॥ ३६॥✎ 1696
रुक्मिणैवमधिक्षिप्तो राजभिश्चोपहासितः।
क्रुद्धः परिघमुद्यम्य जघ्ने तं नृम्णसंसदि॥ ३६
रुक्मीके इस प्रकार आक्षेप और राजाओंके उपहास करनेपर बलरामजी क्रोधसे आगबबूला हो उठे। उन्होंने एक मुद्गर उठाया और उस मांगलिक सभामें ही रुक्मीको मार डाला॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.61.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 524) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/61/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)