श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.61.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 61 · अथैकषष्टितमोऽध्यायः

दौहित्रायानिरुद्धाय पौत्रीं रुक्म्यददाद्धरेः।

रोचनां बद्धवैरोऽपि स्वसुः प्रियचिकीर्षया।

जानन्‍नधर्मं तद् यौनं स्नेहपाशानुबन्धनः॥ २५

dauhitrāyāniruddhāya pautrīṃ rukmyadadāddhareḥ|

rocanāṃ baddhavairo'pi svasuḥ priyacikīrṣayā|

jānannadharmaṃ tad yaunaṃ snehapāśānubandhanaḥ|| 25

अर्थ

परीक्षित्! रुक्मीका भगवान् श्रीकृष्णके साथ पुराना वैर था। फिर भी अपनी बहिन रुक्मिणीको प्रसन्‍न करनेके लिये उसने अपनी पौत्री रोचनाका विवाह रुक्मिणीके पौत्र, अपने नाती (दौहित्र) अनिरुद्धके साथ कर दिया। यद्यपि रुक्मीको इस बातका पता था कि इस प्रकारका विवाह-सम्बन्ध धर्मके अनुकूल नहीं है, फिर भी स्नेह-बन्धनमें बँधकर उसने ऐसा कर दिया॥ २५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें