श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं सौरतसंलापैर्भगवान् जगदीश्‍वरः।

स्वरतो रमया रेमे नरलोकं विडम्बयन्॥ ५८

evaṃ sauratasaṃlāpairbhagavān jagadīśvaraḥ|

svarato ramayā reme naralokaṃ viḍambayan|| 58

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं। वे जब मनुष्योंकी-सी लीला कर रहे हैं, तब उसमें दाम्पत्य-प्रेमको बढ़ानेवाले विनोदभरे वार्तालाप भी करते हैं और इस प्रकार लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजीके साथ विहार करते हैं॥ ५८॥

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