पुण्यमयी प्रिये! मैंने तुम्हारा पतिप्रेम और पातिव्रत्य भी भलीभाँति देख लिया। मैंने उलटी-सीधी बात कह-कहकर तुम्हें विचलित करना चाहा था; परन्तु तुम्हारी बुद्धि मुझसे तनिक भी इधर-उधर न हुई॥ ५१॥
उपलब्धं पतिप्रेम पातिव्रत्यं च तेऽनघे।
यद्वाक्यैश्चाल्यमानाया न धीर्मय्यपकर्षिता॥ ५१
पुण्यमयी प्रिये! मैंने तुम्हारा पतिप्रेम और पातिव्रत्य भी भलीभाँति देख लिया। मैंने उलटी-सीधी बात कह-कहकर तुम्हें विचलित करना चाहा था; परन्तु तुम्हारी बुद्धि मुझसे तनिक भी इधर-उधर न हुई॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 518) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/51/