अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है। तुम अपने अनुरूप किसी श्रेष्ठ क्षत्रियको वरण कर लो। जिसके द्वारा तुम्हारी इहलोक और परलोककी सारी आशा-अभिलाषाएँ पूरी हो सकें॥ १७॥✎ 1438
अथात्मनोऽनुरूपं वै भजस्व क्षत्रियर्षभम्।
येन त्वमाशिषः सत्या इहामुत्र च लप्स्यसे॥ १७
अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है। तुम अपने अनुरूप किसी श्रेष्ठ क्षत्रियको वरण कर लो। जिसके द्वारा तुम्हारी इहलोक और परलोककी सारी आशा-अभिलाषाएँ पूरी हो सकें॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 512) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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