श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

व्रजन्तमव्याद् वैकुण्ठ आसीनं त्वां श्रियः पतिः।

भुंजानं यज्ञभुक् पातु सर्वग्रहभयंकरः॥ २६

vrajantamavyād vaikuṇṭha āsīnaṃ tvāṃ śriyaḥ patiḥ|

bhuṃjānaṃ yajñabhuk pātu sarvagrahabhayaṃkaraḥ|| 26

अर्थ

चलते समय भगवान् वैकुण्ठ और बैठते समय भगवान् श्रीपति तेरी रक्षा करें। भोजनके समय समस्त ग्रहोंको भयभीत करनेवाले यज्ञभोक्ता भगवान् तेरी रक्षा करें॥ २६॥

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