श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

डाकिन्यो यातुधान्यश्‍च कूष्माण्डा येऽर्भकग्रहाः।

भूतप्रेतपिशाचाश्‍च यक्षरक्षोविनायकाः॥ २७

ḍākinyo yātudhānyaśca kūṣmāṇḍā ye'rbhakagrahāḥ|

bhūtapretapiśācāśca yakṣarakṣovināyakāḥ|| 27

अर्थ

डाकिनी, राक्षसी और कूष्माण्डा आदि बालग्रह; भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस और विनायक, कोटरा, रेवती, ज्येष्ठा, पूतना, मातृका आदि; शरीर, प्राण तथा इन्द्रियोंका नाश करनेवाले उन्माद (पागलपन) एवं अपस्मार (मृगी) आदि रोग; स्वप्नमें देखे हुए महान् उत्पात, वृद्धग्रह और बालग्रह आदि—ये सभी अनिष्ट भगवान् विष्णुका नामोच्चारण करनेसे भयभीत होकर नष्ट हो जायँ*॥ २७—२९॥

यह अर्थ श्लोक 27–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. *

    इस प्रसंगको पढ़कर भावुक भक्त भगवान्‌से कहता है—‘भगवन्! जान पड़ता है, आपकी अपेक्षा भी आपके नाममें शक्ति अधिक है; क्योंकि आप त्रिलोकीकी रक्षा करते हैं और नाम आपकी रक्षा कर रहा है।’

     

    (मुद्रित पृष्ठ 160)

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