उन राजकुमारियोंमेंसे प्रत्येकने अलग-अलग अपने मनमें यही निश्चय किया कि ‘ये श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों और विधाता मेरी इस अभिलाषाको पूर्ण करें।’ इस प्रकार उन्होंने प्रेम-भावसे अपना हृदय भगवान्के प्रति निछावर कर दिया॥ ३५॥
भूयात् पतिरयं मह्यं धाता तदनुमोदताम्।
इति सर्वाः पृथक् कृष्णे भावेन हृदयं दधुः॥ ३५
उन राजकुमारियोंमेंसे प्रत्येकने अलग-अलग अपने मनमें यही निश्चय किया कि ‘ये श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों और विधाता मेरी इस अभिलाषाको पूर्ण करें।’ इस प्रकार उन्होंने प्रेम-भावसे अपना हृदय भगवान्के प्रति निछावर कर दिया॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.59.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 508) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/35/