श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति भूम्यार्थितो वाग्भिर्भगवान् भक्तिनम्रया।

दत्त्वाभयं भौमगृहं प्राविशत् सकलर्द्धिमत्॥ ३२

iti bhūmyārthito vāgbhirbhagavān bhaktinamrayā|

dattvābhayaṃ bhaumagṛhaṃ prāviśat sakalarddhimat|| 32

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पृथ्वीने भक्तिभावसे विनम्र होकर इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति-प्रार्थना की, तब उन्होंने भगदत्तको अभयदान दिया और भौमासुरके समस्त सम्पत्तियोंसे सम्पन्‍न महलमें प्रवेश किया॥ ३२॥

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