श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

अहं पयो ज्योतिरथानिलो नभो

मात्राणि देवा मन इन्द्रियाणि।

कर्ता महानित्यखिलं चराचरं

त्वय्यद्वितीये भगवन्‍नयं भ्रमः॥ ३०

ahaṃ payo jyotirathānilo nabho

mātrāṇi devā mana indriyāṇi|

kartā mahānityakhilaṃ carācaraṃ

tvayyadvitīye bhagavannayaṃ bhramaḥ|| 30

अर्थ

भगवन्! मैं (पृथ्वी), जल, अग्‍नि, वायु, आकाश, पंचतन्मात्राएँ, मन, इन्द्रिय और इनके अधिष्ठातृ-देवता, अहंकार और महत्तत्त्व—कहाँतक कहूँ, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके अद्वितीय स्वरूपमें भ्रमके कारण ही पृथक् प्रतीत हो रहा है॥ ३०॥✎ 1694

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1694 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्व-रूपमें → स्वरूपमें

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