॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.59.29
त्वं वै सिसृक्षू रज उत्कटं प्रभो
तमो निरोधाय बिभर्ष्यसंवृतः।
स्थानाय सत्त्वं जगतो जगत्पते
कालः प्रधानं पुरुषो भवान् परः॥ २९
tvaṃ vai sisṛkṣū raja utkaṭaṃ prabho
tamo nirodhāya bibharṣyasaṃvṛtaḥ|
sthānāya sattvaṃ jagato jagatpate
kālaḥ pradhānaṃ puruṣo bhavān paraḥ|| 29
अर्थ
प्रभो! जब आप जगत्की रचना करना चाहते हैं, तब उत्कट रजोगुणको, और जब इसका प्रलय करना चाहते हैं तब तमोगुणको, तथा जब इसका पालन करना चाहते हैं तब सत्त्वगुणको स्वीकार करते हैं। परन्तु यह सब करनेपर भी आप इन गुणोंसे ढकते नहीं, लिप्त नहीं होते। जगत्पते! आप स्वयं ही प्रकृति, पुरुष और दोनोंके संयोग-वियोगके हेतु काल हैं तथा उन तीनोंसे परे भी हैं॥ २९॥✎ 1694