उसका जगमगाता हुआ सिर कुण्डल और सुन्दर किरीटके सहित पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसे देखकर भौमासुरके सगे-सम्बन्धी हाय-हाय पुकार उठे, ऋषिलोग ‘साधु साधु’ कहने लगे और देवतालोग भगवान्पर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे॥ २२॥✎ 2115
सकुण्डलं चारुकिरीटभूषणं
बभौ पृथिव्यां पतितं समुज्ज्वलत्।
हाहेति साध्वित्यृषयः सुरेश्वरा
माल्यैर्मुकुन्दं विकिरन्त ईडिरे॥ २२
उसका जगमगाता हुआ सिर कुण्डल और सुन्दर किरीटके सहित पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसे देखकर भौमासुरके सगे-सम्बन्धी हाय-हाय पुकार उठे, ऋषिलोग ‘साधु साधु’ कहने लगे और देवतालोग भगवान्पर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.59.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 506) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)