श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

शूलं भौमोऽच्युतं हन्तुमाददे वितथोद्यमः।

तद्विसर्गात् पूर्वमेव नरकस्य शिरो हरिः।

अपाहरद् गजस्थस्य चक्रेण क्षुरनेमिना॥ २१

śūlaṃ bhaumo'cyutaṃ hantumādade vitathodyamaḥ|

tadvisargāt pūrvameva narakasya śiro hariḥ|

apāharad gajasthasya cakreṇa kṣuraneminā|| 21

अर्थ

अब भौमासुरने देखा कि मेरी एक भी चाल नहीं चलती, सारे उद्योग विफल होते जा रहे हैं, तब उसने श्रीकृष्णको मार डालनेके लिये एक त्रिशूल उठाया। परन्तु उसे अभी वह छोड़ भी न पाया था कि भगवान् श्रीकृष्णने छुरेके समान तीखी धारवाले चक्रसे हाथीपर बैठे हुए भौमासुरका सिर काट डाला॥ २१॥✎ 2115

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