श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इन्द्रेण हृतच्छत्रेण हृतकुण्डलबन्धुना।✎ 1965

हृतामराद्रिस्थानेन ज्ञापितो भौमचेष्टितम्।

सभार्यो गरुडारूढः प्राग्ज्योतिषपुरं ययौ॥ २

indreṇa hṛtacchatreṇa hṛtakuṇḍalabandhunā|

hṛtāmarādristhānena jñāpito bhaumaceṣṭitam|

sabhāryo garuḍārūḍhaḥ prāgjyotiṣapuraṃ yayau|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! भौमासुरने वरुणका छत्र, माता अदितिके कुण्डल और मेरु पर्वतपर स्थित देवताओंका मणिपर्वत नामक स्थान छीन लिया था। इसपर सबके राजा इन्द्र द्वारकामें आये और उसकी एक-एक करतूत उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णको सुनायी। अब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्‍नी सत्यभामाके साथ गरुड़पर सवार हुए और भौमासुरकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुरमें गये॥ २॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1965 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): हृतछत्रेण → हृतच्छत्रेण

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