श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.48

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजपत्‍न्यश्‍च दुहितुः कृष्णं लब्ध्वा प्रियं पतिम्।

लेभिरे परमानन्दं जातश्‍च परमोत्सवः॥ ४८

rājapatnyaśca duhituḥ kṛṣṇaṃ labdhvā priyaṃ patim|

lebhire paramānandaṃ jātaśca paramotsavaḥ|| 48

अर्थ

रानियोंने देखा कि हमारी कन्याको उसके अत्यन्त प्यारे भगवान् श्रीकृष्ण ही पतिके रूपमें प्राप्त हो गये हैं। उन्हें बड़ा आनन्द हुआ और चारों ओर बड़ा भारी उत्सव मनाया जाने लगा॥ ४८॥

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