श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजोवाच

कोऽन्यस्तेऽभ्यधिको नाथ कन्यावर इहेप्सितः।

गुणैकधाम्‍नो यस्यांगे श्रीर्वसत्यनपायिनी॥ ४१

ko'nyaste'bhyadhiko nātha kanyāvara ihepsitaḥ|

guṇaikadhāmno yasyāṃge śrīrvasatyanapāyinī|| 41

अर्थ

राजा न‌ग्‍नजित‍्ने कहा—‘प्रभो! आप समस्त गुणोंके धाम हैं, एकमात्र आश्रय हैं। आपके वक्षःस्थलपर भगवती लक्ष्मी नित्य-निरन्तर निवास करती हैं। आपसे बढ़कर कन्याके लिये अभीष्ट वर भला और कौन हो सकता है?॥ ४१॥

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