राजा नग्नजित्ने कहा—‘प्रभो! आप समस्त गुणोंके धाम हैं, एकमात्र आश्रय हैं। आपके वक्षःस्थलपर भगवती लक्ष्मी नित्य-निरन्तर निवास करती हैं। आपसे बढ़कर कन्याके लिये अभीष्ट वर भला और कौन हो सकता है?॥ ४१॥
कोऽन्यस्तेऽभ्यधिको नाथ कन्यावर इहेप्सितः।
गुणैकधाम्नो यस्यांगे श्रीर्वसत्यनपायिनी॥ ४१
राजा नग्नजित्ने कहा—‘प्रभो! आप समस्त गुणोंके धाम हैं, एकमात्र आश्रय हैं। आपके वक्षःस्थलपर भगवती लक्ष्मी नित्य-निरन्तर निवास करती हैं। आपसे बढ़कर कन्याके लिये अभीष्ट वर भला और कौन हो सकता है?॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.58.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 501) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/58/41/