श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

नरेन्द्र याच्ञा कविभिर्विगर्हिता

राजन्यबन्धोर्निजधर्मवर्तिनः ।

तथापि याचे तव सौहृदेच्छया

कन्यां त्वदीयां न हि शुल्कदा वयम्॥ ४०

narendra yācñā kavibhirvigarhitā

rājanyabandhornijadharmavartinaḥ |

tathāpi yāce tava sauhṛdecchayā

kanyāṃ tvadīyāṃ na hi śulkadā vayam|| 40

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! जो क्षत्रिय अपने धर्ममें स्थित है, उसका कुछ भी माँगना उचित नहीं। धर्मज्ञ विद्वानोंने उसके इस कर्मकी निन्दा की है। फिर भी मैं आपसे सौहार्दका—प्रेमका सम्बन्ध स्थापित करनेके लिये आपकी कन्या चाहता हूँ। हमारे यहाँ इसके बदलेमें कुछ शुल्क देनेकी प्रथा नहीं है॥ ४०॥

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