श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

परिष्वज्याच्युतं वीरा अंगसंगहतैनसः।

सानुरागस्मितं वक्त्रं वीक्ष्य तस्य मुदं ययुः॥ ३

pariṣvajyācyutaṃ vīrā aṃgasaṃgahatainasaḥ|

sānurāgasmitaṃ vaktraṃ vīkṣya tasya mudaṃ yayuḥ|| 3

अर्थ

वीर पाण्डवोंने भगवान् श्रीकृष्णका आलिंगन किया, उनके अंग-संगसे इनके सारे पाप-ताप धुल गये। भगवान्‌की प्रेमभरी मुसकराहटसे सुशोभित मुख-सुषमा देखकर वे आनन्दमें म‌ग्‍न हो गये॥ ३॥

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