॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.57.30
अक्रूरे प्रोषितेऽरिष्टान्यासन् वै द्वारकौकसाम्।
शारीरा मानसास्तापा मुहुर्दैविकभौतिकाः॥ ३०
akrūre proṣite'riṣṭānyāsan vai dvārakaukasām|
śārīrā mānasāstāpā muhurdaivikabhautikāḥ|| 30
अर्थ
परीक्षित्! कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि अक्रूरके द्वारकासे चले जानेपर द्वारकावासियोंको बहुत प्रकारके अनिष्टों और अरिष्टोंका सामना करना पड़ा। दैविक और भौतिक निमित्तोंसे बार-बार वहाँके नागरिकोंको शारीरिक और मानसिक कष्ट सहना पड़ा। परन्तु जो लोग ऐसा कहते हैं, वे पहले कही हुई बातोंको भूल जाते हैं। भला, यह भी कभी सम्भव है कि जिन भगवान् श्रीकृष्णमें समस्त ऋषि-मुनि निवास करते हैं, उनके निवासस्थान द्वारकामें उनके रहते कोई उपद्रव खड़ा हो जाय॥ ३०-३१॥