जब इस प्रकार अक्रूरजीने भी उसे कोरा जवाब दे दिया, तब शतधन्वाने स्यमन्तकमणि उन्हींके पास रख दी और आप चार सौ कोस लगातार चलनेवाले घोड़ेपर सवार होकर वहाँसे बड़ी फुर्तीसे भागा॥ १८॥✎ 1692
प्रत्याख्यातः स तेनापि शतधन्वा महामणिम्।
तस्मिन् न्यस्याश्वमारुह्य शतयोजनगं ययौ॥ १८
जब इस प्रकार अक्रूरजीने भी उसे कोरा जवाब दे दिया, तब शतधन्वाने स्यमन्तकमणि उन्हींके पास रख दी और आप चार सौ कोस लगातार चलनेवाले घोड़ेपर सवार होकर वहाँसे बड़ी फुर्तीसे भागा॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.57.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 493) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/57/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)