श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यस्येषदुत्कलितरोषकटाक्षमोक्षै-

र्वर्त्मादिशत् क्षुभितनक्रतिमिंगिलोऽब्धिः।

सेतुः कृतः स्वयश उज्ज्वलिता च लंका

रक्षःशिरांसि भुवि पेतुरिषुक्षतानि॥ २८

yasyeṣadutkalitaroṣakaṭākṣamokṣai-

rvartmādiśat kṣubhitanakratimiṃgilo'bdhiḥ|

setuḥ kṛtaḥ svayaśa ujjvalitā ca laṃkā

rakṣaḥśirāṃsi bhuvi peturiṣukṣatāni|| 28

अर्थ

प्रभो! मुझे स्मरण है, आपने अपने नेत्रोंमें तनिक-सा क्रोधका भाव लेकर तिरछी दृष्टिसे समुद्रकी ओर देखा था। उस समय समुद्रके अंदर रहनेवाले बड़े-बड़े नाक (घड़ियाल) और मगरमच्छ क्षुब्ध हो गये थे और समुद्रने आपको मार्ग दे दिया था। तब आपने उसपर सेतु बाँधकर सुन्दर यशकी स्थापना की तथा लंकाका विध्वंस किया। आपके बाणोंसे कट-कटकर राक्षसोंके सिर पृथ्वीपर लोट रहे थे (अवश्य ही आप मेरे वे ही ‘रामजी’ श्रीकृष्णके रूपमें आये हैं)’॥ २८॥✎ 2114

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2114 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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