श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

त्वं हि विश्‍वसृजां स्रष्टा सृज्यानामपि यच्च सत्।

कालः कलयतामीशः पर आत्मा तथाऽऽत्मनाम्॥ २७

tvaṃ hi viśvasṛjāṃ sraṣṭā sṛjyānāmapi yacca sat|

kālaḥ kalayatāmīśaḥ para ātmā tathā''tmanām|| 27

अर्थ

आप विश्‍वके रचयिता ब्रह्मा आदिको भी बनानेवाले हैं। बनाये हुए पदार्थोंमें भी सत्तारूपसे आप ही विराजमान हैं। कालके जितने भी अवयव हैं, उनके नियामक परम काल आप ही हैं और शरीर-भेदसे भिन्‍न-भिन्‍न प्रतीयमान अन्तरात्माओंके परम आत्मा भी आप ही हैं॥ २७॥✎ 2114

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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