sukhaduḥkhado na cānyo'sti yataḥ svakṛtabhuk pumān|| 38
अर्थ
इसके बाद बलरामजीने रुक्मिणीको सम्बोधन करके कहा— ‘साध्वी! तुम्हारे भाईका रूप विकृत कर दिया गया है, यह सोचकर हमलोगोंसे बुरा न मानना; क्योंकि जीवको सुख-दुःख देनेवाला कोई दूसरा नहीं है। उसे तो अपने ही कर्मका फल भोगना पड़ता है’॥ ३८॥
मैवास्मान् साध्व्यसूयेथा भ्रातुर्वैरूप्यचिन्तया।
सुखदुःखदो न चान्योऽस्ति यतः स्वकृतभुक् पुमान्॥ ३८
इसके बाद बलरामजीने रुक्मिणीको सम्बोधन करके कहा— ‘साध्वी! तुम्हारे भाईका रूप विकृत कर दिया गया है, यह सोचकर हमलोगोंसे बुरा न मानना; क्योंकि जीवको सुख-दुःख देनेवाला कोई दूसरा नहीं है। उसे तो अपने ही कर्मका फल भोगना पड़ता है’॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 478) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/54/38/