श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

असाध्विदं त्वया कृष्ण कृतमस्मज्जुगुप्सितम्।

वपनं श्मश्रुकेशानां वैरूप्यं सुहृदो वधः॥ ३७

asādhvidaṃ tvayā kṛṣṇa kṛtamasmajjugupsitam|

vapanaṃ śmaśrukeśānāṃ vairūpyaṃ suhṛdo vadhaḥ|| 37

अर्थ

‘कृष्ण! तुमने यह अच्छा नहीं किया। यह निन्दित कार्य हमलोगोंके योग्य नहीं है। अपने सम्बन्धीकी दाढ़ी-मूँछ मूँड़कर उसे कुरूप कर देना, यह तो एक प्रकारका वध ही है’॥ ३७॥

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