श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अस्यैव भार्या भवितुं रुक्मिण्यर्हति नापरा।

असावप्यनवद्यात्मा भैष्म्याः समुचितः पतिः॥ ३७

asyaiva bhāryā bhavituṃ rukmiṇyarhati nāparā|

asāvapyanavadyātmā bhaiṣmyāḥ samucitaḥ patiḥ|| 37

अर्थ

वे आपसमें इस प्रकार बातचीत करते थे—रुक्मिणी इन्हींकी अर्द्धांगिनी होनेके योग्य है, और ये परम पवित्रमूर्ति श्यामसुन्दर रुक्मिणीके ही योग्य पति हैं। दूसरी कोई इनकी पत्‍नी होनेके योग्य नहीं है॥ ३७॥

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