॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.53.35
एवं राज्ञां समेतानां यथावीर्यं यथावयः।
यथाबलं यथावित्तं सर्वैः कामैः समर्हयत्॥ ३५
evaṃ rājñāṃ sametānāṃ yathāvīryaṃ yathāvayaḥ|
yathābalaṃ yathāvittaṃ sarvaiḥ kāmaiḥ samarhayat|| 35
अर्थ
विदर्भराज भीष्मकजीके यहाँ निमन्त्रणमें जितने राजा आये थे, उन्होंने उनके पराक्रम, अवस्था, बल और धनके अनुसार सारी इच्छित वस्तुएँ देकर सबका खूब सत्कार किया॥ ३५॥