श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालनेमिर्हतः कंसः प्रलम्बाद्याश्‍च सद‍्द्विषः।

अयं च यवनो दग्धो राजंस्ते तिग्मचक्षुषा॥ ४२

kālanemirhataḥ kaṃsaḥ pralambādyāśca saddviṣaḥ|

ayaṃ ca yavano dagdho rājaṃste tigmacakṣuṣā|| 42

अर्थ

अबतक मैं कालनेमि असुरका, जो कंसके रूपमें पैदा हुआ था, तथा प्रलम्ब आदि अनेकों साधुद्रोही असुरोंका संहार कर चुका हूँ। राजन्! यह कालयवन था, जो मेरी ही प्रेरणासे तुम्हारी तीक्ष्ण दृष्टि पड़ते ही भस्म हो गया॥ ४२॥

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