काल समस्त बलवानोंसे भी बलवान् है। वह स्वयं परम समर्थ अविनाशी और भगवत्स्वरूप है। जैसे ग्वाले पशुओंको अपने वशमें रखते हैं, वैसे ही वह खेल-खेलमें सारी प्रजाको अपने अधीन रखता है॥ १९॥
कालो बलीयान् बलिनां भगवानीश्वरोऽव्ययः।
प्रजाः कालयते क्रीडन् पशुपालो यथा पशून्॥ १९
काल समस्त बलवानोंसे भी बलवान् है। वह स्वयं परम समर्थ अविनाशी और भगवत्स्वरूप है। जैसे ग्वाले पशुओंको अपने वशमें रखते हैं, वैसे ही वह खेल-खेलमें सारी प्रजाको अपने अधीन रखता है॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.51.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 454) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/51/19/