श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.55

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सुधर्मां पारिजातं च महेन्द्रः प्राहिणोद्धरेः।

यत्र चावस्थितो मर्त्यो मर्त्यधर्मैर्न युज्यते॥ ५५

sudharmāṃ pārijātaṃ ca mahendraḥ prāhiṇoddhareḥ|

yatra cāvasthito martyo martyadharmairna yujyate|| 55

अर्थ

परीक्षित्! उस समय देवराज इन्द्रने भगवान् श्रीकृष्णके लिये पारिजातवृक्ष और सुधर्मा-सभाको भेज दिया। वह सभा ऐसी दिव्य थी कि उसमें बैठे हुए मनुष्यको भूख-प्यास आदि मर्त्यलोकके धर्म नहीं छू पाते थे॥ ५५॥

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