श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजतारकुटैः कोष्ठैर्हेमकुम्भैरलंकृतैः।

रत्‍नकूटैर्गृहैर्हैमैर्महामरकतस्थलैः ॥ ५३

rājatārakuṭaiḥ koṣṭhairhemakumbhairalaṃkṛtaiḥ|

ratnakūṭairgṛhairhaimairmahāmarakatasthalaiḥ || 53

अर्थ

अन्‍न रखनेके लिये चाँदी और पीतलके बहुत-से कोठे बने हुए थे। वहाँके महल सोनेके बने हुए थे और उनपर कामदार सोनेके कलश सजे हुए थे। उनके शिखर रत्‍नोंके थे तथा गच पन्‍नेकी बनी हुई बहुत भली मालूम होती थी॥ ५३॥

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