अन्न रखनेके लिये चाँदी और पीतलके बहुत-से कोठे बने हुए थे। वहाँके महल सोनेके बने हुए थे और उनपर कामदार सोनेके कलश सजे हुए थे। उनके शिखर रत्नोंके थे तथा गच पन्नेकी बनी हुई बहुत भली मालूम होती थी॥ ५३॥
राजतारकुटैः कोष्ठैर्हेमकुम्भैरलंकृतैः।
रत्नकूटैर्गृहैर्हैमैर्महामरकतस्थलैः ॥ ५३
अन्न रखनेके लिये चाँदी और पीतलके बहुत-से कोठे बने हुए थे। वहाँके महल सोनेके बने हुए थे और उनपर कामदार सोनेके कलश सजे हुए थे। उनके शिखर रत्नोंके थे तथा गच पन्नेकी बनी हुई बहुत भली मालूम होती थी॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.50.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 451) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/53/