श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तस्मादद्य विधास्यामो दुर्गं द्विपददुर्गमम्।

तत्र ज्ञातीन् समाधाय यवनं घातयामहे॥ ४९

tasmādadya vidhāsyāmo durgaṃ dvipadadurgamam|

tatra jñātīn samādhāya yavanaṃ ghātayāmahe|| 49

अर्थ

इसलिये आज हमलोग एक ऐसा दुर्ग—ऐसा किला बनायेंगे, जिसमें किसी भी मनुष्यका प्रवेश करना अत्यन्त कठिन होगा। अपने स्वजन-सम्बन्धियोंको उसी किलेमें पहुँचाकर फिर इस यवनका वध करायेंगे’॥ ४९॥

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