इसलिये आज हमलोग एक ऐसा दुर्ग—ऐसा किला बनायेंगे, जिसमें किसी भी मनुष्यका प्रवेश करना अत्यन्त कठिन होगा। अपने स्वजन-सम्बन्धियोंको उसी किलेमें पहुँचाकर फिर इस यवनका वध करायेंगे’॥ ४९॥
तस्मादद्य विधास्यामो दुर्गं द्विपददुर्गमम्।
तत्र ज्ञातीन् समाधाय यवनं घातयामहे॥ ४९
इसलिये आज हमलोग एक ऐसा दुर्ग—ऐसा किला बनायेंगे, जिसमें किसी भी मनुष्यका प्रवेश करना अत्यन्त कठिन होगा। अपने स्वजन-सम्बन्धियोंको उसी किलेमें पहुँचाकर फिर इस यवनका वध करायेंगे’॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.50.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 451) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/49/