श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यवनोऽयं निरुन्धेऽस्मानद्य तावन्महाबलः।

मागधोऽप्यद्य वा श्‍वो वा परश्‍वो वाऽऽगमिष्यति॥ ४७

yavano'yaṃ nirundhe'smānadya tāvanmahābalaḥ|

māgadho'pyadya vā śvo vā paraśvo vā''gamiṣyati|| 47

अर्थ

आज इस परम बलशाली यवनने हमें आकर घेर लिया है और जरासन्ध भी आज, कल या परसोंमें आ ही जायेगा॥ ४७॥

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