श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

रुरोध मथुरामेत्य तिसृभिर्म्लेच्छकोटिभिः।

नृलोके चाप्रतिद्वन्द्वो वृष्णीञ्छ्रुत्वाऽऽत्मसम्मितान्॥ ४५

rurodha mathurāmetya tisṛbhirmlecchakoṭibhiḥ|

nṛloke cāpratidvandvo vṛṣṇīñchrutvā''tmasammitān|| 45

अर्थ

युद्धमें कालयवनके सामने खड़ा होनेवाला वीर संसारमें दूसरा कोई न था। उसने जब यह सुना कि यदुवंशी हमारे ही-जैसे बलवान् हैं और हमारा सामना कर सकते हैं, तब तीन करोड़ म्लेच्छोंकी सेना लेकर उसने मथुराको घेर लिया॥ ४५॥

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