श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

स तदप्रियमाकर्ण्य शोकामर्षयुतो नृप।

अयादवीं महीं कर्तुं चक्रे परममुद्यमम्॥ ३

sa tadapriyamākarṇya śokāmarṣayuto nṛpa|

ayādavīṃ mahīṃ kartuṃ cakre paramamudyamam|| 3

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भरतवंशशिरोमणि परीक्षित्! कंसकी दो रानियाँ थीं—अस्ति और प्राप्ति। पतिकी मृत्युसे उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे अपने पिताकी राजधानीमें चली गयीं॥ १॥ उन दोनोंका पिता था मगधराज जरासन्ध। उससे उन्होंने बड़े दुःखके साथ अपने विधवा होनेके कारणोंका वर्णन किया॥ २॥ परीक्षित्! यह अप्रिय समाचार सुनकर पहले तो जरासन्धको बड़ा शोक हुआ, परन्तु पीछे वह क्रोधसे तिलमिला उठा। उसने यह निश्‍चय करके कि मैं पृथ्वीपर एक भी यदुवंशी नहीं रहने दूँगा, युद्धकी बहुत बड़ी तैयारी की॥ ३॥ और तेईस अक्षौहिणी सेनाके साथ यदुवंशियोंकी राजधानी मथुराको चारों ओरसे घेर लिया॥ ४॥

यह व्याख्या श्लोक 10.50.1 से 10.50.4 तककी एक साथ है।

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