श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

गावो वृषा२ वत्सतरा हरिद्रातैलरूषिताः।

विचित्रधातुबर्हस्रग्वस्त्रकांचनमालिनः ॥ ७

gāvo vṛṣā vatsatarā haridrātailarūṣitāḥ|

vicitradhātubarhasragvastrakāṃcanamālinaḥ || 7

अर्थ

गाय, बैल और बछड़ोंके अंगोंमें हल्दी-तेलका लेप कर दिया गया और उन्हें गेरू आदि रंगीन धातुएँ, मोरपंख, फूलोंके हार, तरह-तरहके सुन्दर वस्त्र और सोनेकी जंजीरोंसे सजा दिया गया॥ ७॥✎ 1400 1401 1402 2059 2235 2236

टिप्पणियाँ

  1. २

    षाः सवत्साश्‍च हरि०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 151)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #1400 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वंदीजनण् → वंदीजन
  • #1401 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मागधञ् → मागध
  • #1402 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वस्त्रा-भूषण → वस्त्राभूषण
  • #2059 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2235 टिप्पणी: → वंशका वर्णन करनेवाले।
  • #2236 टिप्पणी: → समयानुसार उक्तियोंसे स्तुति करनेवाले भाट। जैसा कि कहा है—‘सूताः पौराणिकाः प्रोक्ता मागधा      वंशशंसकाः । वन्दिनस्त्वमलप्रज्ञाः प्रस्तावसदृशोक्तयः॥’ 

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